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कौन हैं बंशीधर ब्रजवासी? शिक्षामित्र से MLC तक का सफर, केके पाठक से टकराव और BJP से जुड़ाव पर क्यों है चर्चा

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कौन हैं बंशीधर ब्रजवासी? शिक्षामित्र से MLC तक का सफर, केके पाठक से टकराव और BJP से जुड़ाव पर क्यों है चर्चा

बिहार की राजनीति में बंशीधर ब्रजवासी का नाम इन दिनों काफी चर्चा में है। कभी सरकारी स्कूल में शिक्षामित्र के रूप में अपनी नौकरी शुरू करने वाले ब्रजवासी आज बिहार विधान परिषद के चर्चित चेहरों में शामिल हैं। शिक्षकों के अधिकारों के लिए आंदोलन, शिक्षा विभाग के तत्कालीन अपर मुख्य सचिव केके पाठक के कार्यकाल में विभागीय कार्रवाई और लगातार दो बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने तक का उनका सफर कई उतार-चढ़ाव से गुजरा है। हाल ही में तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से दूसरी बार जीत दर्ज करने के बाद उनका नाम एक बार फिर बिहार की सियासत में चर्चा के केंद्र में आ गया है। वहीं, 31 अक्टूबर 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात और भाजपा के साथ उनके जुड़ाव को लेकर भी राजनीतिक बहस शुरू हो गई है।

मुजफ्फरपुर जिले के मड़वन प्रखंड स्थित रक्सा गांव के रहने वाले बंशीधर ब्रजवासी की पहचान शुरुआत में एक शिक्षक और शिक्षक संगठनों से जुड़े कार्यकर्ता के रूप में थी। उन्होंने मिथिला विश्वविद्यालय से परास्नातक की पढ़ाई की है। उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में शिक्षामित्र के रूप में नियुक्ति से हुई। उस समय शिक्षामित्रों की नियुक्ति सीमित अवधि के लिए होती थी। उनकी सेवा अवधि को नियमित और पूर्णकालिक बनाने की मांग लंबे समय से उठती रही थी। ब्रजवासी ने इसी मुद्दे को अपने संघर्ष का आधार बनाया।

शिक्षामित्रों के अधिकारों की लड़ाई से मिली पहचान

शिक्षक के रूप में काम करते हुए बंशीधर ब्रजवासी को महसूस हुआ कि शिक्षामित्रों और नियोजित शिक्षकों की सेवा शर्तों, वेतन तथा नौकरी की सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दे लंबे समय से लंबित हैं। इसी को लेकर उन्होंने शिक्षकों को संगठित करना शुरू किया। उन्होंने परिवर्तनकारी प्रारंभिक शिक्षक संघ का गठन किया और शिक्षकों की मांगों को लेकर आंदोलन की राह चुनी। 23 जनवरी 2006 से शुरू हुए अनशन के जरिए उन्होंने शिक्षामित्रों की सेवा को नियमित करने की मांग को प्रमुखता से उठाया। धीरे-धीरे उनका आंदोलन मुजफ्फरपुर से निकलकर बिहार के दूसरे जिलों तक भी चर्चा में आने लगा।

ब्रजवासी केवल ज्ञापन और बैठकों तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने शिक्षकों की मांगों को लेकर धरना, प्रदर्शन और आंदोलन किए। वर्ष 2013 में पटना में शिक्षक आंदोलन के दौरान लाठीचार्ज की घटना के बाद उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था। इसके बाद वर्ष 2015 में नियोजित शिक्षकों को राज्यकर्मी का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर उन्होंने रथयात्रा निकाली। इस दौरान बक्सर में भी उन्हें गिरफ्तार किया गया था। इन घटनाओं ने शिक्षक समुदाय के बीच उनकी पहचान को और मजबूत किया।

शिक्षामित्रों की सेवा व्यवस्था में बाद में बदलाव हुआ और उन्हें पंचायत तथा प्रखंड शिक्षक के रूप में काम करने का अवसर मिला। ब्रजवासी भी शिक्षामित्र से पंचायत शिक्षक बने। हालांकि, शिक्षक संगठनों के बीच उनकी सक्रियता लगातार बनी रही। वह वेतन, सेवा शर्तों, स्थानांतरण, शिक्षकों की सुरक्षा और विभागीय फैसलों जैसे मुद्दों पर मुखर होकर अपनी बात रखते रहे। इसी वजह से बिहार के नियोजित शिक्षकों के बीच उनका एक अलग समर्थक वर्ग तैयार हुआ।

केके पाठक के कार्यकाल में बढ़ा विवाद, पहले निलंबन फिर बर्खास्तगी

बंशीधर ब्रजवासी के राजनीतिक जीवन में वर्ष 2024 काफी अहम साबित हुआ। उस समय बिहार के शिक्षा विभाग के तत्कालीन अपर मुख्य सचिव केके पाठक शिक्षा व्यवस्था में कई प्रशासनिक बदलावों को लेकर चर्चा में थे। विभाग की ओर से शिक्षकों की उपस्थिति, निरीक्षण, सक्षमता परीक्षा और शिक्षक संगठनों की गतिविधियों से जुड़े फैसले लागू किए जा रहे थे। इन फैसलों को लेकर शिक्षक संगठनों और शिक्षा विभाग के बीच कई मुद्दों पर विरोध देखने को मिला। ब्रजवासी भी इन फैसलों के खिलाफ आवाज उठाने वाले प्रमुख शिक्षक नेताओं में शामिल थे।

मार्च 2024 में शिक्षकों के विरोध प्रदर्शन के दौरान गुलाब और लाठी आंदोलन का मामला सामने आया। 10 मार्च को मुजफ्फरपुर में परिवर्तनकारी प्रारंभिक शिक्षक संघ के कार्यक्रम में शिक्षकों के बीच लाठियां बांटे जाने को लेकर विवाद हुआ। इस घटनाक्रम के बाद शिक्षा विभाग ने ब्रजवासी समेत कई शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई की। पहले उन्हें निलंबित किया गया और फिर 24 जुलाई 2024 को प्रखंड नियोजन इकाई ने उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। विभागीय कार्रवाई में अनुशासनहीनता और नियमों के विरुद्ध बयानबाजी जैसे आरोपों का हवाला दिया गया था।

नौकरी जाने के बाद ब्रजवासी ने अपनी लड़ाई को राजनीतिक मंच तक पहुंचाने का फैसला किया। उनके समर्थकों ने इसे शिक्षक हितों की आवाज उठाने वाले नेता के खिलाफ कार्रवाई के रूप में देखा। खासकर सरकारी स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों के बीच इस घटनाक्रम को लेकर चर्चा हुई। यही वह दौर था जब उनकी पहचान एक शिक्षक संगठन के नेता से आगे बढ़कर चुनावी राजनीति के दावेदार के रूप में बनने लगी।

2024 के उपचुनाव में निर्दलीय जीत ने चौंकाया

दिसंबर 2024 में बिहार विधान परिषद की तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की सीट पर हुए उपचुनाव में बंशीधर ब्रजवासी ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपनी दावेदारी पेश की। उनके सामने विभिन्न राजनीतिक दलों के समर्थित उम्मीदवार थे। चुनाव में उनकी मुख्य चुनौती जन सुराज समर्थित उम्मीदवार डॉ. विनायक गौतम से थी। इसके अलावा राजद और जदयू समर्थित उम्मीदवार भी मैदान में थे।

इस चुनाव में ब्रजवासी ने अपनी शिक्षक नेता वाली पहचान को राजनीतिक समर्थन में बदलने में सफलता हासिल की। पहली वरीयता के मतों की गिनती के बाद भी वह मजबूत स्थिति में थे। हालांकि, अंतिम फैसला दूसरी वरीयता के मतों की गणना के बाद हुआ। परिणाम में बंशीधर ब्रजवासी को कुल 27,744 मत मिले, जबकि डॉ. विनायक गौतम को 16,829 मत प्राप्त हुए। इस तरह उन्होंने 10,915 मतों के अंतर से जीत दर्ज की और पहली बार बिहार विधान परिषद पहुंचे।

यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण थी, क्योंकि ब्रजवासी ने किसी बड़े राजनीतिक दल के चुनाव चिह्न के बिना अपनी दावेदारी पेश की थी। शिक्षक समुदाय के बीच उनकी सक्रियता और नौकरी से बर्खास्तगी के बाद बनी सहानुभूति भी उनकी चुनावी सफलता के महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में देखी गई। पहली जीत के बाद उन्होंने विधान परिषद में शिक्षकों और स्नातक मतदाताओं से जुड़े मुद्दों को उठाने की जिम्मेदारी संभाली।

2026 में फिर जीते चुनाव, जदयू प्रत्याशी को 9,147 वोटों से हराया

पहली जीत के बाद वर्ष 2026 में तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में ब्रजवासी एक बार फिर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे। इस बार भी उनके सामने एनडीए समर्थित जदयू उम्मीदवार अभिषेक झा समेत कई राजनीतिक दलों के प्रत्याशी थे। चुनाव के दौरान मुकाबला काफी दिलचस्प रहा और शुरुआत से ही ब्रजवासी प्रमुख दावेदारों में बने रहे।

मतगणना पूरी होने के बाद बंशीधर ब्रजवासी ने 31,832 मत हासिल किए, जबकि जदयू समर्थित अभिषेक झा को 22,685 मत मिले। इस तरह ब्रजवासी ने 9,147 मतों के अंतर से जीत दर्ज की। राजद समर्थित डॉ. रश्मि विनायक गौतम को 14,931 और जन सुराज के उम्मीदवार डॉ. विमोहन कुमार को 2,327 मत प्राप्त हुए। वरीयता आधारित मतगणना की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ब्रजवासी को विजेता घोषित किया गया।

लगातार दूसरी बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल करना उनके राजनीतिक सफर का एक बड़ा पड़ाव माना जा रहा है। 2024 में पहली बार विधान परिषद पहुंचने के बाद 2026 में दोबारा जीत दर्ज कर उन्होंने यह दिखाया कि तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में उनका अपना समर्थक आधार बना हुआ है। जदयू जैसे सत्तारूढ़ गठबंधन के प्रमुख घटक दल के समर्थित उम्मीदवार को हराना इस चुनाव को और महत्वपूर्ण बनाता है।

यहां यह समझना भी जरूरी है कि तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र सामान्य विधानसभा सीट की तरह नहीं है। यह बिहार विधान परिषद की स्नातक कोटे की सीट है, जहां निर्धारित योग्यता रखने वाले और निर्वाचन सूची में पंजीकृत स्नातक मतदाता मतदान करते हैं। इसलिए ब्रजवासी की शिक्षक आंदोलन से बनी पहचान के साथ-साथ स्नातक मतदाताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता भी उनकी चुनावी सफलता में अहम रही है।

बंशीधर ब्रजवासी के भाजपा से जुड़ाव पर क्यों उठा सवाल?

लगातार दूसरी बार चुनाव जीतने के कुछ ही दिनों बाद 31 अक्टूबर 2026 को बंशीधर ब्रजवासी का राजनीतिक घटनाक्रम एक बार फिर चर्चा में आ गया। उन्होंने सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय जीतने वाले राहुल राज के साथ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात की। इसके बाद दोनों नेताओं का भाजपा के साथ जुड़ाव सामने आया। इस घटनाक्रम को बिहार में एनडीए की राजनीति और विधान परिषद के नए समीकरणों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

हालांकि, इस पूरे मामले में भाजपा की ओर से अलग स्पष्टीकरण भी सामने आया। पार्टी ने कहा कि दोनों निर्दलीय विधान पार्षदों ने भाजपा की सदस्यता नहीं ली है, बल्कि एनडीए सरकार को अपना समर्थन दिया है। दूसरी ओर, सदस्यता से जुड़ी तस्वीरों और ब्रजवासी के सार्वजनिक बयानों के आधार पर उनके भाजपा में शामिल होने की खबरें भी सामने आईं। बाद में एक बातचीत में ब्रजवासी ने केवल समर्थन देने की बात कही। इस वजह से उनकी वास्तविक राजनीतिक स्थिति को लेकर चर्चा और तेज हो गई है।

इस घटनाक्रम पर राजद और जन सुराज की ओर से भी सवाल उठाए गए हैं। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि यदि कोई उम्मीदवार निर्दलीय चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल की औपचारिक सदस्यता ग्रहण करता है, तो संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत उसकी विधान परिषद सदस्यता पर सवाल उठ सकता है। विपक्ष ने इस मामले को विधान परिषद के सभापति के सामने उठाने और जरूरत पड़ने पर कानूनी रास्ता अपनाने की बात कही है। ऐसे मामलों में अंतिम संवैधानिक निर्णय संबंधित सदन के सभापति के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसलिए समर्थन देने और औपचारिक रूप से पार्टी में शामिल होने के बीच का अंतर इस विवाद का महत्वपूर्ण पहलू है।

बंशीधर ब्रजवासी की अब तक की राजनीतिक यात्रा को देखें तो उनकी सबसे बड़ी ताकत शिक्षक समुदाय के बीच बनी पहचान रही है। एक शिक्षामित्र के रूप में करियर शुरू करने के बाद उन्होंने शिक्षक संगठनों के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की। विभागीय कार्रवाई और नौकरी से बर्खास्तगी के बाद उन्होंने चुनावी राजनीति में कदम रखा और लगातार दो बार विधान परिषद का चुनाव जीतने में सफल रहे। अब भाजपा और एनडीए के साथ उनके रिश्ते को लेकर उठे सवालों के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वह विधान परिषद में शिक्षकों और स्नातक मतदाताओं से जुड़े मुद्दों को किस तरह आगे बढ़ाते हैं।

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