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पूर्णिया का महेंद्रपुर धाम: पीपल के पेड़ के नीचे विराजती हैं मां काली, दीपावली की आधी रात होती है विशेष पूजा

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पूर्णिया का महेंद्रपुर धाम: पीपल के पेड़ के नीचे विराजती हैं मां काली, दीपावली की आधी रात होती है विशेष पूजा

बिहार के पूर्णिया जिले में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जिनकी पहचान भव्य मंदिरों और बड़ी इमारतों से नहीं, बल्कि लोगों की अटूट आस्था और वर्षों पुरानी परंपराओं से बनी है। पूर्णिया पूर्व प्रखंड के महेंद्रपुर धाम स्थित मां काली मंदिर भी ऐसा ही एक धार्मिक स्थल है। यहां न तो बड़े-बड़े पंडालों की चकाचौंध देखने को मिलती है और न ही दीपावली के अवसर पर किसी विशेष सजावट का दिखावा होता है। इसके बावजूद मां काली के दर्शन के लिए श्रद्धालु दूर-दराज के इलाकों से पहुंचते हैं। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां दीपावली की मध्यरात्रि में मां काली की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। स्थानीय मान्यता है कि इसी समय मां अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए आती हैं।

पूर्णिया पूर्व प्रखंड के बेलौरी-सोनाली सड़क किनारे स्थित महेंद्रपुर धाम का यह मंदिर लंबे समय से स्थानीय लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रहा है। विशाल पीपल के पेड़ के नीचे बने छोटे से मंदिर में मां काली विराजमान हैं। मंदिर का वातावरण आसपास के ग्रामीण परिवेश और प्राकृतिक सुंदरता के बीच एक अलग ही अनुभूति कराता है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए पीपल का पेड़ भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना मां काली का मंदिर। इसी पेड़ की छांव में भक्त पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाओं को लेकर माता के दरबार में पहुंचते हैं।

महेंद्रपुर धाम की सबसे अलग परंपरा दीपावली की रात होने वाली काली पूजा है। आमतौर पर बड़े मंदिरों में त्योहारों के दौरान आकर्षक रोशनी, भव्य सजावट और विशेष आयोजन देखने को मिलते हैं, लेकिन यहां पूजा की पहचान सादगी और पारंपरिक आस्था है। दीपावली की मध्यरात्रि में पूरे विधि-विधान के साथ मां काली की आराधना की जाती है। स्थानीय श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस विशेष समय में मां का आगमन होता है। यही कारण है कि वर्षों से लोग दीपावली के अवसर पर इस पूजा में शामिल होने को विशेष महत्व देते आए हैं।

इस मंदिर की एक और विशेषता यह बताई जाती है कि यहां पूजा-पाठ के लिए किसी बड़े धार्मिक आयोजन या पारंपरिक तामझाम पर निर्भरता नहीं है। मंदिर की देखरेख और सेवा स्थानीय सेवायतों के माध्यम से होती है। मंगनी देवी और पप्पू बाबा मंदिर में मां की सेवा से जुड़े हैं। स्थानीय लोग अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए पूजा की व्यवस्था में सहयोग करते हैं। मंदिर समिति में युवा और बुजुर्ग दोनों की भागीदारी रहती है। इस तरह मंदिर की धार्मिक परंपराओं को बनाए रखने में ग्रामीण समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका है।

पीपल के पेड़ से जुड़ी है अनोखी मान्यता

महेंद्रपुर धाम के काली मंदिर परिसर में मौजूद विशाल पीपल का पेड़ श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र है। स्थानीय लोगों का मानना है कि पेड़ की अलग-अलग शाखाओं और पत्तियों में मां काली के विभिन्न स्वरूपों की झलक दिखाई देती है। श्रद्धालु इस पेड़ को केवल एक प्राकृतिक संरचना नहीं, बल्कि माता की उपस्थिति से जुड़ा पवित्र स्थान मानते हैं। मंदिर आने वाले कई भक्त पेड़ के नीचे कुछ समय बिताते हैं और अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।

इस पीपल के पेड़ पर गरुड़ पक्षियों के रहने की भी चर्चा स्थानीय स्तर पर होती है। बताया जाता है कि यहां करीब एक दर्जन पक्षियों का बसेरा है। स्थानीय श्रद्धालुओं की मान्यता है कि ये पक्षी मां काली के सेवक हैं और मंदिर परिसर की विशेष पहचान का हिस्सा हैं। हालांकि, पक्षियों की प्रजाति और उनकी वास्तविक संख्या की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद यह मान्यता लंबे समय से मंदिर से जुड़ी स्थानीय धार्मिक चर्चाओं में शामिल रही है।

हिंदू ही नहीं, मुस्लिम श्रद्धालुओं की भी है आस्था

महेंद्रपुर धाम स्थित मां काली मंदिर की एक महत्वपूर्ण विशेषता यहां दिखाई देने वाला सामाजिक और धार्मिक सौहार्द है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस मंदिर में केवल हिंदू ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के कुछ श्रद्धालु भी अपनी मन्नतें लेकर पहुंचते हैं। अलग-अलग धर्मों के लोगों का इस स्थान से जुड़ाव इसे क्षेत्र के सामान्य धार्मिक स्थलों से कुछ अलग पहचान देता है। मंदिर में पहुंचने वाले श्रद्धालु अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार माता की पूजा करते हैं और परिवार की सुख-शांति तथा खुशहाली की कामना करते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि मां काली के प्रति लोगों का विश्वास पीढ़ियों से चला आ रहा है। किसी के परिवार में परेशानी हो, कोई नई शुरुआत करना चाहता हो या किसी विशेष मनोकामना को लेकर भक्त माता के दरबार में पहुंचना चाहते हों, इस मंदिर में आने वालों का सिलसिला बना रहता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद माता अवश्य सुनती हैं। हालांकि, मनोकामना पूरी होने से जुड़ी बातें धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत विश्वास का विषय हैं।

मंदिर से जुड़ी एक अन्य परंपरा बलि प्रथा भी है। स्थानीय विवरणों के अनुसार, यहां बलि चढ़ाने की परंपरा प्रचलित है, जबकि नवरात्र के दौरान इसे बंद रखा जाता है। इस परंपरा के पीछे स्थानीय धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। मंदिर की विभिन्न परंपराएं और पूजा पद्धतियां यहां के पुराने रीति-रिवाजों का हिस्सा रही हैं।

78 साल पुराना बताया जाता है मंदिर का इतिहास

महेंद्रपुर धाम स्थित मां काली मंदिर को स्थानीय स्तर पर करीब 78 वर्ष पुरानी आस्था का केंद्र बताया जाता है। हालांकि, मंदिर की स्थापना की सटीक तारीख को लेकर स्पष्ट दस्तावेजी जानकारी उपलब्ध नहीं है। स्थानीय इतिहास से जुड़े विवरणों में एक अन्य महत्वपूर्ण जानकारी सामने आती है। इसके अनुसार, वर्ष 1980 के आसपास पूर्णिया पूर्व प्रखंड में अमीन के पद पर सिवान निवासी अशोक कुमार पांडेय की नियुक्ति हुई थी। स्थानीय मान्यता के मुताबिक, इसी दौरान उन्हें मां काली से संबंधित स्वप्न आया, जिसके बाद मंदिर निर्माण की पहल की गई। गांव के लोगों के सहयोग से मंदिर का निर्माण कराया गया।

मंदिर की उम्र को लेकर इन दोनों जानकारियों में अंतर दिखाई देता है। वर्ष 2026 में 78 वर्ष की अवधि का अर्थ लगभग 1948 के आसपास की शुरुआत होता है, जबकि अशोक कुमार पांडेय से जुड़ा स्थानीय विवरण 1980 के आसपास मंदिर निर्माण की बात करता है। इसलिए मंदिर की स्थापना का कोई एक निश्चित वर्ष बताना अभी उचित नहीं होगा। इतना जरूर है कि महेंद्रपुर धाम में मां काली की पूजा और उनसे जुड़ी आस्था कई वर्षों से कायम है।

समय के साथ मंदिर परिसर में भी बदलाव हुए हैं। पुराने मंदिर भवन का नवीनीकरण कराया गया है और परिसर में अन्य धार्मिक संरचनाओं का निर्माण भी हुआ है। पहले की तुलना में मंदिर परिसर को व्यवस्थित करने की कोशिश की गई है। इसके बावजूद मां काली के मूल स्थान और विशाल पीपल के पेड़ से जुड़ी पुरानी पहचान आज भी बरकरार है।

1988 से हो रही है मां दुर्गा की पूजा

महेंद्रपुर धाम की पहचान केवल मां काली मंदिर तक सीमित नहीं है। यहां मां दुर्गा की पूजा की भी लंबी परंपरा रही है। स्थानीय पूजा समिति से जुड़ी जानकारी के अनुसार, वर्ष 1988 में तत्कालीन मुखिया स्वर्गीय भुवनेश्वर पोद्दार की पहल पर मंदिर परिसर में मां दुर्गा की स्थापना की गई थी। उस समय अशोक कुमार पांडेय ने महेंद्रपुर के ग्रामीणों के सहयोग से राधा-कृष्ण मंदिर का निर्माण कराया था। इसी मंदिर में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती थी।

बाद में युवा समिति की पहल पर परिसर में अलग दुर्गा मंदिर का निर्माण कराया गया। वर्ष 2019 से नए दुर्गा मंदिर में पूजा-अर्चना शुरू होने का उल्लेख स्थानीय रिपोर्टों में मिलता है। पुराने राधा-कृष्ण मंदिर में राधा-कृष्ण की प्रतिमाएं भी स्थापित की गईं। इस तरह समय के साथ महेंद्रपुर धाम का धार्मिक परिसर विकसित होता गया और यहां मां काली के साथ मां दुर्गा तथा राधा-कृष्ण की आराधना की व्यवस्था भी बनी।

दुर्गा पूजा के दौरान यहां ग्रामीण संस्कृति की भी खास झलक देखने को मिलती है। नवरात्र के पहले दिन से ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाता है। अष्टमी, नवमी और दशमी के अवसर पर मंदिर परिसर में विशेष भीड़ रहती है। पूजा-अर्चना के साथ मेले का भी आयोजन किया जाता है, जहां बच्चों और परिवारों के लिए विभिन्न प्रकार की दुकानें आकर्षण का केंद्र बनती हैं। अष्टमी के अवसर पर महाभोग और भक्ति जागरण जैसे आयोजन भी किए जाते हैं। पूजा समिति के सदस्य और स्थानीय युवा आयोजन को सफल बनाने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

स्थानीय रिपोर्टों में दुर्गा पूजा समिति के 41 सदस्यों का उल्लेख भी किया गया है। पूजा की व्यवस्था, श्रद्धालुओं की सुविधा और मेले के आयोजन में समिति के सदस्य मिलकर जिम्मेदारी निभाते हैं। ग्रामीण परिवेश में इस तरह का सामूहिक आयोजन धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ सामाजिक मेलजोल का भी अवसर बनता है।

मंदिर में दीपावली के समय श्रद्धालुओं की भीड़ विशेष रूप से बढ़ जाती है। कोसी और सीमांचल के अलग-अलग क्षेत्रों के अलावा पश्चिम बंगाल और पड़ोसी देश नेपाल से भी भक्तों के पहुंचने की जानकारी स्थानीय स्तर पर मिलती है। कई श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने के बाद माता के दरबार में चढ़ावा अर्पित करने आते हैं। दीपावली से लेकर छठ पर्व तक मंदिर परिसर में भक्तों की आवाजाही बनी रहती है। भीड़ को देखते हुए स्थानीय स्तर पर सुरक्षा और व्यवस्था की जिम्मेदारी भी निभाई जाती है।

मां काली के भक्त राम प्रसाद पोद्दार के अनुसार, इस मंदिर के प्रति लोगों का विश्वास लंबे समय से कायम है। उनके मुताबिक, श्रद्धालु यहां अपनी परेशानियां और मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं। इसी विश्वास के कारण दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग माता के दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर की सेवा से जुड़ी मंगनी देवी भी मां के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा व्यक्त करती हैं।

महेंद्रपुर धाम की खासियत यही है कि यहां धार्मिक पहचान केवल मंदिर की इमारत या उसके विस्तार से नहीं बनी है। विशाल पीपल का पेड़, दीपावली की मध्यरात्रि में होने वाली विशेष पूजा, विभिन्न समुदायों के श्रद्धालुओं की भागीदारी और ग्रामीणों का सामूहिक सहयोग इस स्थान को अलग पहचान देते हैं। करीब 78 वर्ष पुरानी आस्था के दावे के साथ जुड़ा यह मंदिर आज भी पूर्णिया और आसपास के क्षेत्रों के लोगों के लिए श्रद्धा का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।

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