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रिम्स निदेशक की कुर्सी पर अब भी असमंजस, डॉ. डीके सिन्हा के सेवा-विस्तार और स्थायी नियुक्ति पर टिकी निगाहें

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रिम्स निदेशक की कुर्सी पर अब भी असमंजस, डॉ. डीके सिन्हा के सेवा-विस्तार और स्थायी नियुक्ति पर टिकी निगाहें

रांची: झारखंड के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थान राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) में निदेशक पद को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। पूर्व निदेशक डॉ. राजकुमार के इस्तीफे के बाद संस्थान की जिम्मेदारी संभाल रहे प्रो. डॉ. दीपेंद्र कुमार सिन्हा के कार्यकाल को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं। स्थायी निदेशक की नियुक्ति की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं होने और कार्यकारी जिम्मेदारी संभाल रहे वरिष्ठ डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति नजदीक होने से रिम्स के प्रशासनिक नेतृत्व को लेकर चुनौती बढ़ गई है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग और राज्य सरकार के अगले फैसले पर संस्थान के डॉक्टरों, कर्मचारियों और मरीजों की नजर है।

रिम्स में निदेशक का पद 25 जून 2026 को डॉ. राजकुमार के इस्तीफे के बाद खाली हुआ था। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने सर्जरी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. दीपेंद्र कुमार सिन्हा को तत्काल प्रभाव से निदेशक का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया था। उन्हें अगले आदेश तक संस्थान के निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि, यह व्यवस्था स्थायी नियुक्ति के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि संस्थान का कामकाज सुचारु रखने के लिए अंतरिम व्यवस्था के रूप में की गई थी।

डॉ. राजकुमार ने जनवरी 2024 में तीन वर्ष के कार्यकाल के लिए रिम्स निदेशक का पद संभाला था। उनका कार्यकाल जनवरी 2027 तक निर्धारित था, लेकिन उन्होंने 25 जून 2026 को पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे से पहले सीआईडी की टीम ने रिम्स में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामलों की जांच के सिलसिले में कार्रवाई की थी। जांच में वर्ष 2025 के एमबीबीएस नामांकन और टेंडर से संबंधित शिकायतें भी शामिल थीं। हालांकि, जांच में लगे आरोपों को किसी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

डॉ. डीके सिन्हा की सेवानिवृत्ति ने बढ़ाई प्रशासनिक चुनौती

रिम्स में निदेशक पद को लेकर सबसे बड़ी चुनौती वरिष्ठता और सेवानिवृत्ति की तारीखों से जुड़ी है। प्रभात खबर की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभारी निदेशक प्रो. डॉ. दीपेंद्र कुमार सिन्हा की जन्मतिथि 29 अक्टूबर 1959 है। इस आधार पर उनकी निर्धारित सेवानिवृत्ति की तारीख 29 अक्टूबर 2026 थी। यानी स्थायी निदेशक की नियुक्ति से पहले ही मौजूदा प्रभारी निदेशक की सेवानिवृत्ति का समय आ गया।

इसके बाद संस्थान में वरिष्ठता के आधार पर दूसरे नंबर पर आने वाले प्रो. डॉ. राजीव मिश्रा को प्रभारी निदेशक की जिम्मेदारी सौंपे जाने की संभावना जताई गई थी। लेकिन उनकी जन्मतिथि 8 दिसंबर 1959 होने के कारण वे भी दिसंबर 2026 में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। ऐसी स्थिति में यदि स्थायी निदेशक की नियुक्ति नहीं होती है, तो संस्थान को दोबारा अंतरिम नेतृत्व की व्यवस्था करनी पड़ सकती है।

वरिष्ठता सूची के आधार पर इसके बाद प्रो. डॉ. हिरेंद्र बिरुआ का नाम भी सामने आया था। हालांकि, किसे निदेशक का प्रभार सौंपा जाएगा, यह रिम्स की प्रमाणित वरिष्ठता सूची, लागू नियमों और सक्षम प्राधिकारी के औपचारिक आदेश पर निर्भर करेगा। केवल वरिष्ठता के आधार पर किसी नियुक्ति को अंतिम नहीं माना जा सकता।

इस पूरे मामले में रिम्स नियमावली, 2002 का नियम 9(v) भी महत्वपूर्ण है। इस प्रावधान के तहत निदेशक का पद रिक्त होने पर नए निदेशक की नियुक्ति होने तक वरिष्ठतम प्रोफेसर को अधिकतम छह महीने के लिए कार्यकारी जिम्मेदारी देने की व्यवस्था बताई गई है। छह महीने से अधिक अवधि तक ऐसी व्यवस्था जारी रखने के लिए राज्य सरकार की पूर्व अनुमति आवश्यक होती है। वर्ष 2015 में झारखंड हाईकोर्ट के एक मामले में भी इस प्रावधान की व्याख्या करते हुए अस्थायी नियुक्ति और सरकारी अनुमति के महत्व को रेखांकित किया गया था।

66वीं शासी परिषद की बैठक में सेवा-विस्तार पर हुई चर्चा

निदेशक पद की समस्या को देखते हुए 15 अक्टूबर 2026 को रिम्स की 66वीं शासी परिषद (गवर्निंग बॉडी) की बैठक में भी इस मुद्दे को प्रमुखता से रखा गया था। बैठक में प्रभारी निदेशक डॉ. डीके सिन्हा के कार्यकाल को एक वर्ष तक बढ़ाने के प्रस्ताव पर विचार किया गया। इसके लिए रिम्स की नियमावली में आवश्यक संशोधन और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया पर भी चर्चा हुई।

बैठक के बाद सामने आई जानकारी के अनुसार, डॉ. सिन्हा के सेवा-विस्तार से संबंधित प्रस्ताव को अंतिम निर्णय के लिए राज्य मंत्रिमंडल के पास भेजा जाना था। इसके साथ ही संस्थान में स्थायी निदेशक की नियुक्ति के लिए जल्द विज्ञापन जारी करने की बात भी कही गई थी। हालांकि, सेवा-विस्तार और स्थायी नियुक्ति दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। सेवा-विस्तार से मौजूदा नेतृत्व को जारी रखा जा सकता है, जबकि स्थायी नियुक्ति के लिए निर्धारित चयन प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

2 नवंबर 2026 तक उपलब्ध रिम्स की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रो. डॉ. दीपेंद्र कुमार सिन्हा का नाम निदेशक एवं सीईओ के रूप में दर्ज है। हालांकि, वेबसाइट पर पदनाम दर्ज होने मात्र से 29 अक्टूबर के बाद उनके सेवा-विस्तार की प्रशासनिक और कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं होती। इसके लिए सरकार या संबंधित विभाग की औपचारिक अधिसूचना महत्वपूर्ण होगी। स्थायी निदेशक की नियुक्ति के लिए विज्ञापन और चयन प्रक्रिया की स्थिति भी स्पष्ट होना बाकी है।

स्थायी निदेशक की नियुक्ति क्यों है जरूरी?

रिम्स केवल झारखंड का एक बड़ा सरकारी अस्पताल नहीं है, बल्कि राज्य में चिकित्सा शिक्षा, शोध और गंभीर बीमारियों के इलाज का प्रमुख केंद्र भी है। यहां निदेशक की जिम्मेदारी सिर्फ अस्पताल के रोजमर्रा के प्रशासन तक सीमित नहीं रहती। निदेशक संस्थान का प्रमुख और मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है। उसे प्रशासनिक व्यवस्था, वित्तीय प्रबंधन, विकास योजनाओं, नियुक्तियों और महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों के क्रियान्वयन में अहम भूमिका निभानी होती है।

प्रभारी निदेशक के पास भी सौंपे गए अधिकारों के तहत संस्थान का संचालन करने की जिम्मेदारी होती है, लेकिन बार-बार नेतृत्व बदलने से प्रशासनिक निरंतरता प्रभावित होने की आशंका रहती है। किसी नए प्रभारी को संस्थान की व्यवस्था, लंबित फाइलों, विभागीय प्राथमिकताओं और चल रही परियोजनाओं को समझने में समय लग सकता है। इसके अलावा, सेवानिवृत्ति नजदीक होने पर बड़े और दीर्घकालिक नीतिगत फैसलों को लेकर भी अनिश्चितता बनी रह सकती है।

रिम्स में इस समय कई महत्वपूर्ण विकास योजनाओं पर काम आगे बढ़ाने की तैयारी है। 66वीं शासी परिषद की बैठक में 10 नए विभाग शुरू करने, सुपर स्पेशियलिटी की 150 अतिरिक्त सीटें बढ़ाने, पीजी सीटों को 176 से बढ़ाकर 250 करने और नर्सिंग स्टाफ के 106 नए पद सृजित करने जैसे प्रस्तावों पर निर्णय लिया गया। इसके अलावा संस्थान के भवनों और परिसर के पुनर्विकास के लिए लगभग 466 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना भी सामने आई है।

इन योजनाओं को जमीन पर उतारने के लिए सिर्फ वित्तीय मंजूरी पर्याप्त नहीं होगी। नियुक्तियों, उपकरणों की खरीद, निर्माण कार्य, निविदा प्रक्रिया और विभागों के संचालन के लिए लगातार प्रशासनिक निगरानी की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में स्थायी नेतृत्व मिलने से फैसलों की जवाबदेही और उनके क्रियान्वयन में निरंतरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इसका सीधा संबंध मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं और मेडिकल विद्यार्थियों की पढ़ाई से भी है।

स्थायी निदेशक की नियुक्ति के लिए योग्यता और अनुभव भी महत्वपूर्ण हैं। रिम्स की निर्धारित नियुक्ति प्रक्रिया में चिकित्सा, सर्जरी या जनस्वास्थ्य से संबंधित उच्चतर योग्यता के साथ शिक्षण, शोध और प्रशासनिक अनुभव को महत्व दिया जाता है। संस्थान के प्रमुख पद पर ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है, जिसे चिकित्सा सेवाओं के साथ बड़े चिकित्सा संस्थान के प्रबंधन का भी अनुभव हो। इसलिए नियुक्ति प्रक्रिया को जल्द पूरा करने के साथ पारदर्शिता और निर्धारित नियमों का पालन करना भी जरूरी है।

फिलहाल रिम्स के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि डॉ. डीके सिन्हा के सेवा-विस्तार को लेकर सरकार क्या अंतिम फैसला करती है और स्थायी निदेशक की नियुक्ति के लिए विज्ञापन कब जारी होता है। दिसंबर में वरिष्ठता सूची के एक और प्रमुख डॉक्टर की सेवानिवृत्ति प्रस्तावित होने से यह मामला और महत्वपूर्ण हो गया है। अगर नियुक्ति प्रक्रिया में देरी होती है, तो संस्थान को दोबारा अंतरिम व्यवस्था पर निर्भर रहना पड़ सकता है। रिम्स जैसे बड़े चिकित्सा संस्थान के लिए बार-बार नेतृत्व बदलने के बजाय जल्द स्थायी निदेशक की नियुक्ति करना प्रशासनिक स्थिरता और स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के लिहाज से जरूरी माना जा रहा है।

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