जयपुर में आयोजित राष्ट्रीय लोक कला महोत्सव ‘लोकरंग 2026’ में देश की अलग-अलग लोक संस्कृतियों की शानदार झलक देखने को मिल रही है। जवाहर कला केंद्र में चल रहे इस महोत्सव में झारखंड की पारंपरिक छऊ नृत्य कला भी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। 31 अक्टूबर को आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में झारखंड के कलाकारों ने पुरुलिया छऊ नृत्य की प्रस्तुति दी। पारंपरिक वेशभूषा, बड़े-बड़े आकर्षक मुखौटों, दमदार शारीरिक गतिविधियों और लोक संगीत के तालमेल ने दर्शकों का ध्यान खींचा। कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से झारखंड की समृद्ध लोक परंपरा को राष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित किया।
लोकरंग महोत्सव का आयोजन 27 अक्टूबर से 6 नवंबर 2026 तक जवाहर कला केंद्र, जयपुर में किया जा रहा है। यह इस महोत्सव का 29वां संस्करण है। राष्ट्रीय लोक नृत्य समारोह के साथ यहां राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला भी आयोजित किया गया है। महोत्सव में राजस्थान सहित देश के विभिन्न राज्यों से आए लोक कलाकार अपनी पारंपरिक नृत्य और संगीत कलाओं का प्रदर्शन कर रहे हैं। अलग-अलग प्रदेशों की वेशभूषा, संगीत, वाद्ययंत्र और नृत्य शैलियां इस आयोजन को खास बना रही हैं।
31 अक्टूबर को आयोजित कार्यक्रम में आठ राज्यों की 12 लोक प्रस्तुतियां शामिल रहीं। इनमें झारखंड का पुरुलिया छऊ, राजस्थान का चंग नृत्य, महाराष्ट्र की लावणी, तमिलनाडु का थप्पाट्टम, मणिपुर का थांग-ता और गुजरात का तलवार रास प्रमुख रहे। हर प्रस्तुति के साथ संबंधित राज्य की सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक कलाओं की झलक देखने को मिली। झारखंड के कलाकारों की छऊ प्रस्तुति में विशेष रूप से पारंपरिक मुखौटों और नृत्य की नाटकीय शैली ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया।
मुखौटों और युद्धकला का अनूठा संगम है छऊ नृत्य
छऊ नृत्य झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी एक विशिष्ट नृत्य परंपरा है। इसमें लोकनृत्य के साथ-साथ युद्धकला, शारीरिक कौशल, पारंपरिक संगीत और पौराणिक कथाओं का अनूठा मेल देखने को मिलता है। इसकी प्रस्तुतियों में रामायण, महाभारत, धार्मिक आख्यानों और लोककथाओं के प्रसंगों को नृत्य के माध्यम से जीवंत किया जाता है। कलाकारों के कदमों की गति, शरीर की मुद्राएं, छलांग और नियंत्रित गतिविधियां इस नृत्य को दूसरी लोक नृत्य शैलियों से अलग पहचान देती हैं।
छऊ नृत्य की तीन प्रमुख क्षेत्रीय शैलियां सरायकेला, पुरुलिया और मयूरभंज हैं। सरायकेला शैली झारखंड के सरायकेला-खरसावां क्षेत्र से जुड़ी है। इसमें छोटे और भावपूर्ण मुखौटों के साथ नियंत्रित, सूक्ष्म और अर्द्धशास्त्रीय नृत्य गतिविधियां देखने को मिलती हैं। पुरुलिया शैली में बड़े और आकर्षक मुखौटों, रंगीन वेशभूषा तथा अधिक ऊर्जावान और नाटकीय गतिविधियों का विशेष महत्व है। वहीं ओडिशा की मयूरभंज शैली में कलाकार बिना मुखौटे के अपने चेहरे और शारीरिक भाव-भंगिमाओं के माध्यम से पात्रों को प्रस्तुत करते हैं।
इन तीनों शैलियों की अपनी अलग पहचान और प्रस्तुति परंपरा है। इसलिए जयपुर के लोकरंग में 31 अक्टूबर को हुई प्रस्तुति को पुरुलिया छऊ के रूप में पहचानना जरूरी है। इसे सरायकेला शैली कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। दोनों झारखंड और पूर्वी भारत की समृद्ध छऊ परंपरा का हिस्सा हैं, लेकिन उनकी नृत्य तकनीक, मुखौटों और प्रस्तुति की शैली में अंतर है।
छऊ नृत्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली हुई है। वर्ष 2010 में इसे यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया था। यह मान्यता इस कला की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्ता को दर्शाती है। छऊ केवल मंच पर होने वाली नृत्य प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह उन समुदायों की परंपराओं, जीवनशैली, धार्मिक मान्यताओं और पीढ़ियों से चली आ रही कलात्मक विरासत का प्रतिनिधित्व करता है, जिन्होंने इसे आज तक जीवित रखा है।
लोक कला के साथ हस्तशिल्प को भी मिल रहा मंच
लोकरंग महोत्सव की विशेषता केवल लोकनृत्य प्रस्तुतियां नहीं हैं। जवाहर कला केंद्र के शिल्पग्राम परिसर में राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला भी लगाया गया है। यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लगभग 150 शिल्पकार अपने पारंपरिक उत्पादों और हुनर का प्रदर्शन कर रहे हैं। हथकरघा वस्त्र, टेराकोटा, लकड़ी की कलाकृतियां, चमड़े के उत्पाद, लोक चित्रकला और पारंपरिक आभूषण मेले के प्रमुख आकर्षणों में शामिल हैं।
हस्तशिल्प मेले के माध्यम से लोगों को पारंपरिक कारीगरी को करीब से समझने और सीधे शिल्पकारों से जुड़ने का अवसर मिल रहा है। ऐसे आयोजन उन कारीगरों के लिए भी महत्वपूर्ण होते हैं, जिनकी कला और आजीविका पीढ़ियों से पारंपरिक हस्तशिल्प पर निर्भर रही है। लोकनृत्य और हस्तशिल्प को एक ही मंच पर स्थान देकर लोकरंग देश की सांस्कृतिक विविधता को व्यापक रूप में सामने ला रहा है।
6 नवंबर तक चलने वाले इस महोत्सव में आने वाले दिनों में भी विभिन्न राज्यों के कलाकार अपनी पारंपरिक कलाओं का प्रदर्शन करेंगे। जयपुर के इस राष्ट्रीय सांस्कृतिक आयोजन में झारखंड की छऊ परंपरा की भागीदारी ने एक बार फिर यह दिखाया है कि देश की लोक कलाएं आज भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए हैं। जरूरत है कि ऐसी कलाओं को केवल उत्सवों तक सीमित रखने के बजाय कलाकारों को नियमित मंच, प्रशिक्षण और आर्थिक सहयोग भी मिले, ताकि यह समृद्ध विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचती रहे।
