छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले में बस्तर दशहरा की तैयारियों के बीच पारंपरिक पदाधिकारियों को वस्त्र-परिधान प्रदान किए गए। जिला कार्यालय के सभाकक्ष में आयोजित कार्यक्रम में बस्तर विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष एवं कोंडागांव विधायक लता उसेण्डी, कलेक्टर नूपुर राशि पन्ना और नगर पालिका अध्यक्ष नरपति पटेल ने मांझी-चालकी, गायता-पुजारी, मेंबर-मेम्बरीन एवं पटेल को वस्त्र-परिधान वितरित किए। इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक पदाधिकारियों को बस्तर दशहरा में शामिल होने के लिए आवश्यक सहयोग प्रदान करना और क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति सम्मान व्यक्त करना है।
कार्यक्रम में जिले के विभिन्न क्षेत्रों से आए पारंपरिक पदाधिकारी उपस्थित रहे। इस दौरान बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक महत्ता, आदिवासी संस्कृति के संरक्षण और पुरानी परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। कार्यक्रम में मौजूद जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने पर्व में शामिल होने के लिए की गई व्यवस्थाओं की जानकारी दी तथा पारंपरिक पदाधिकारियों की सुरक्षित और सुव्यवस्थित यात्रा की कामना की।
आदिवासी संस्कृति के संरक्षण पर विधायक लता उसेण्डी ने दिया जोर
विधायक लता उसेण्डी ने कहा कि बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही परंपराओं और समृद्ध आदिवासी संस्कृति का प्रतीक है। इस पर्व के माध्यम से स्थानीय समुदाय अपनी सांस्कृतिक विरासत, रीति-रिवाजों और सामाजिक परंपराओं से जुड़े रहते हैं। उन्होंने कहा कि समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है, लेकिन अपनी संस्कृति और परंपराओं को सहेजकर आगे बढ़ाना समाज के सभी लोगों की जिम्मेदारी है।
उन्होंने इस अवसर पर कोंडागांव में आदिवासी संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए पांच करोड़ रुपये की लागत से संग्रहालय बनाए जाने की जानकारी भी दी। इस संग्रहालय का उद्देश्य क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना और नई पीढ़ी को आदिवासी समुदायों की परंपराओं, रीति-रिवाजों तथा सांस्कृतिक पहचान से परिचित कराना है। इससे स्थानीय सांस्कृतिक धरोहर को समझने और उसके महत्व को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर मिलेगा।
लता उसेण्डी ने सभी को बस्तर दशहरा की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के साथ-साथ युवाओं और बच्चों को भी इससे जोड़ना जरूरी है। उन्होंने परंपराओं को सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
क्या है बस्तर दशहरा की खासियत?
बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ के सबसे विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल है। जगदलपुर केंद्रित यह पर्व लगभग 75 दिनों तक चलता है। वर्ष 2026 में इसकी शुरुआत 12 अगस्त को पाट जात्रा की परंपरा के साथ हुई। अक्टूबर में इसके प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन हो रहे हैं। इस उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां सामान्य दशहरा उत्सवों की तरह रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। इसके बजाय मां दंतेश्वरी की आराधना, स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़ी परंपराओं, पारंपरिक अनुष्ठानों और रथ यात्रा को विशेष महत्व दिया जाता है।
बस्तर दशहरा में मांझी-चालकी, गायता-पुजारी, मेंबर-मेम्बरीन और पटेल जैसे पारंपरिक पदाधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। ये पदाधिकारी क्षेत्र की पारंपरिक सामाजिक और धार्मिक व्यवस्थाओं से जुड़े होते हैं। अलग-अलग इलाकों से आने वाले समुदायों और उनके प्रतिनिधियों की भागीदारी इस पर्व को विशिष्ट बनाती है। वस्त्र-परिधान वितरण जैसे आयोजन इसी सांस्कृतिक सहभागिता और पारंपरिक व्यवस्थाओं के सम्मान से जुड़े हैं।
इस पर्व के दौरान पाट जात्रा, काछनगादी, जोगी बिठाई, देवी-देवताओं के आगमन और पारंपरिक रथ से जुड़े अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। इन रस्मों के जरिए बस्तर की लोक आस्थाओं, सामुदायिक परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत की झलक दिखाई देती है। यही कारण है कि बस्तर दशहरा को केवल धार्मिक उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्र की जीवंत सांस्कृतिक पहचान के रूप में भी देखा जाता है।
कार्यक्रम में अधिकारी और जनप्रतिनिधि रहे मौजूद
वस्त्र-परिधान वितरण कार्यक्रम में कलेक्टर नूपुर राशि पन्ना और नगर पालिका अध्यक्ष नरपति पटेल के अलावा जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अविनाश भोई, आदिवासी विकास विभाग के सहायक आयुक्त कृपेन्द्र तिवारी, निर्मल शार्दुल सहित अन्य जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी उपस्थित रहे। जिले के विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे पारंपरिक पदाधिकारियों ने भी कार्यक्रम में भाग लिया।
कोंडागांव में आयोजित यह कार्यक्रम बस्तर दशहरा से जुड़ी पारंपरिक संस्थाओं और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को महत्व देने की दिशा में एक पहल है। वहीं, आदिवासी संस्कृति के संरक्षण के लिए प्रस्तावित संग्रहालय की जानकारी ने सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के प्रयासों को भी चर्चा में ला दिया है। पर्व के दौरान होने वाले आयोजन बस्तर की विविध परंपराओं को सामने लाने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का अवसर प्रदान करते हैं।
